यह फ़िल्म मैं खुले दिमाग से देखने बैठा, केवल इस किर्न्द से की शायद यह स्किजोफ्रेनिया के ऊपर है। इसने तो मुझे शुरू से ही हिला दिया। अनुपम खेर और उर्मिला माटोंडकर के प्रदर्शन मेरी आंखों में आँसू ले आयी।
फ़िल्म में अनुपम खेर को एक रिटायर्ड हिन्दी का अध्यापक दिखाया है, जो धीरे-धीरे बुढापे की ओर जाते-जाते, अनिश्चित रूप से, डिमेंशिया/सुदो-डिमेंशिया/अल्ज्हिएमेर्स से पीड़ित हो जाता है। इसकी चित्रांकन मनन को हिला देने वाली है। यह बहुत अच्छी फ़िल्म है एक ऐसी बीमारी जिसमे व्यक्ति चीजें भूलने लगता है। मेरे बहते हुए आँसू ही बहुत हैं। मैं और कुछ नहीं कहना चाहूँगा।
Saturday, October 18, 2008
मैंने गाँधी को नहीं मारा
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फ़िल्म लिपिबद्छ
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