सोरिंग-हाइट्स एक मनोवैज्ञानिक है। पहले तो यह जानना ज़रूरी है की मनोवैज्ञानिक और मनोरोग-चिकित्सक मैं क्या अन्तर है। मनोरोग-चिकित्सक एक चिकित्सक होता है जिसे नुस्खा लिखना आता हो। मनोवैज्ञानिक एक वैज्ञानिक होता है जो व्यक्तियों के मॅन और व्यवहार की रीति का अध्ययन करता है। वह मदद करता है मनोरोग-चिकित्सकाओं को सही नुस्खे की तालाश करने की।
सोरिंग-हाइट्स अनेक अस्पतालों में, अनेक मनोरोग के प्रति काम कर चुकी हैं। मुख्य रूचि स्कित्ज़ोफ्रएनिआ मैं है। अपनी पढ़ाई मैं वे शुरू से प्रथम रही हैं। वे बहुत ही होनहार वैज्ञानिक हैं और उन्होंने मेरी सोच में परिवर्तन ला कर मेरी ज़िंदगी को एक नया रूप दिया है। हम आशा करते हैं की इस ब्लॉग के माध्यम से आपकी भी मदद कर पाएंगे।
Thursday, March 13, 2008
सोरिंग-हाइट्स का परिचय
Thursday, March 6, 2008
मेरा परिचय
मैं आप सबको अपने बारे में एक छोटा सा परिचय देना चाहूँगा, यह बताने के लिए की मैं भी उन्ही समस्याओं का सामना कर चुका हूँ जिनमे से आप या आपके प्रिय गुज़र रहें हों। मैं मानसिक रोग से पीड़ित हूँ और मुझे अपने अस्तित्व पर गर्व है। मुझे गर्व है की मैं उन चंद व्यक्तियों में से हूँ जो ऐसी परिस्थितियों मे से गुज़ारा हो जिन्हें पाने की न तो किसी की इच्छा हो और न ही किसी को आशा। लोग समझ बैठते हैं की म यह ैं कह रहा हूँ क्योंकि मैं निकल चुका हूँ इन रोग की बुरी नज़रों से। शायद वे सही हैं। मैं नहीं चाहता की किसी और को इन मुश्किलों का सामना करना पढे। इसीलिए मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूँ। मुझे बस गर्व अपने रोग का इसलिए है क्योंकि पिछले करीबन ग्यारह वर्षों से, इसमें समां जाने से ले कर, इससे बाहर निकल आने की कई कोशिशों ने मुझे मनुष्य जीवन अथवा मस्तिष्क की ऐसी सीख दी हैं जो इसके बिना शायद सम्भव न होतीं। इसका यह मतलब नहीं की जो इन मुश्किलों का सामना न करे, वह ज़िंदगी को बारीकी से नहीं देख पाएगा। आखिरकार हर व्यक्ति अद्वितीय है, एक अनमोल रत्न है।
मैं ग्यारह बरस का था जब मुझे रट लग गयी गाने सुनने की, पुरा दिन वही कैसेट। पढ़ाई में मुझे दिक्कत होने लगी और बहुत कम अंकों से अगली कक्षा में जा पाया। अगले दो साल इतनी महनत करी की जैसे वह एक साल बढे होने का एक हिस्सा था। जब चौदाहन वर्ष का हुआ मेरे ख़याल कुछ ज़्यादा मजबूत हो गए। ऐसा लगा जैसे अब मुझमे इतनी हिम्मत आ गयी हो की किसी भी कठिनाई का सामना कर पाऊं। धीरे धीरे, मेरे बिना समझे, मेरे ख्यालों ने एक ऊँचा स्वर ले लिया। वे मुझे सुनने देने लगे। चंद बरस बीत गए। हर कक्षा में पास होना मुश्किल हो गया। मैंने एक ऐसे व्यक्तित्व को अपना लिया जिससे मुझे लगता था की सिर्फ़ मैं ही दुनिया को बचा सकता हूँ। उन ऊँची आवाजों के साथ बातें करने लगा, मन ही मन में। अपने परिवार वालों को अपना दुश्मन मानने लगा। बात करना बंद कर दिया। नींद का तो नामो निशाँ न रहा। घर का माहौल बिगड़ गया। घर से कई बार भागा, भटक भटक के फिर वापस आ जाता। कटे हुए शव दिखाई देते। कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की। अठारह बरस का हुआ, और अपने बोर्ड के अन्तिम परीक्षा से पहले अस्पताल में भरती कराया गया जब मेरी आत्महत्या की कोशिश कामयाबी पर थी। अभी तक मेरे माता पिता को समझ नहीं आ रहा था की मेरा व्यवहार ऐसा क्यों है। मुझे एक मनोवैज्ञानिक के पास भी ले गए थे, परन्तु कोई फरक न पड़ा। अब, मेरे माता पिता, जिन्हें मनोरोग-चिकित्सक से एक किसम का भय था, इस विचार से की वे सबको पागल बना देते हैं, मुझे एक मनोरोग-चिकित्सक के पास ले ही गए। मुझे कह दिया गया की बस थोड़ा सा मन में तनाव है। तबियत मेरी कुछ ठीक होने लगी। एक साल बाद पता लगा की मुझे स्कित्ज़ोफ्रेनिया है। धीरे धीरे यह भी अहसास हुआ की मुझे ओ.सी.डी, यानी, मनोग्रस्त्ता बाध्यकारी की बीमारी भी है।
आज मैं पचीस बरस का होने लगा हूँ, इन्जिनीरिंग कर रहा हूँ, और मेरी ज़िंदगी में बाधा डाल रही है मेरी बाईपोलर की बीमारी, जिसके कारंद मैं कभी उदासी मैं चला जाता हूँ, और कभी मेरा दिमाग इतना फुर्तीला हो जाता है की विचारों को पकड़ नही पाता, यानी, अपनी सोच को ही समझने का समय नही मिलता। मुश्किलें और भी बहुत आती हैं, जिनका ज़िक्र इस ब्लॉग में आगे चलकर होता रहेगा। ज़रूरी बात बस यही हैं की आप समझने की अपेक्षा रखें।
