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Friday, July 18, 2008

स्कित्जोफ्रेनिया

इस बीमारी मैं एक ऐसी व्यवस्था हो जाती है, जिसमे रोगी सच्चाई और अपनी ख़ुद की बनाई दुनिया के बीचों-बीच अन्तर नही जान पाटा। हर रोगी को अलग किस्म के अनुभव अवं कल्पनायें होती हैं अपनी दुनिया की।

१) ज़्यादातर बीमार व्यक्ति को भय होता है की कोई उसे या उसके प्रिय को नुक्सान पहुँचने की कोशिश मैं है।
इस व्यवस्था को पेरानूइड के नाम से जानते हैं।
२) दूसरा किस्म है जिसमें व्यक्ति एक ही जगह पे, एक ही तरह से स्थिर हो जाता है, और बहुत देर बाद हिलता है, कभी कभी तो इतनी देर की उसका बदन नीला पड़ने लगता है। इसकी घटित होने की संभावना ज्यादा उन् देशों मैं या उन जगह मैं कम है जिनमें भाषा विकसित है। इस व्यवस्था को काट्टोनिया कहतें हैं।

काफ़ी समय तक रोगी को ऐसी आवाजें सुनी पढ़ सकती हैं जो असलियत मैं हैं नही, या चीजें दिखाई देने लगें। क्योंकि इन व्यक्तियों का दिमाग यह खेल खेल रहा है, इसलिए समझाना भी काफ़ी बार बेकार सा पढ़ जाता है। समझने की शक्ति भी कम हो जाती है और काम करने की आशा भी नही रहती।

आम तौर पर, पुरुषों मैं यह १३-१४ वर्ष मैं शुरू होता है, और लड़कियों मैं २३-२७ की उम्र के बीच। बूद्धों को अगर इसी प्रकार की बीमारी हो, तो उससे पेराफ्रेनिया का नाम देते हैं। कई बार ८ साल के बच्चों मैं भी यह हो जाता है। हर देश मैं, तकरीबन ०.१% की जनता मैं यह दिमागी हालत पाई जाती है।

इनका इलाज दवाइयां ही कर सकती हैं, जिसके साथ साथ व्यक्ति के ठीक होने की शक्ति, अवेम सबका समर्थन भी ज़रूरी है।

दाएं ओउर मैं जो इसी नाम का लिंक है, वेह इस विषय की बहुत जानकारी देता है, यहाँ तक की पंजाबी, बंगाली, और उर्दू मैं भी।

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