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Saturday, July 26, 2008

Rain Man / रेन मैन (अंग्रेज़ी)

निर्देशक बेरी लिविंसों की यह फ़िल्म, जिसमे टॉम क्रूज़ और दुस्तीं होफ्फ्मन कलाकार हैं, दिखाई गई है एक आदमी (दुस्तीं होफ्फ्मन) जिसे औटीस्म है। उसकी यादार्ष बहुत अच्छी है परन्तु उसे काफी कुच्छ, जो आम आदमी के लिए हर रोज़ का काम हो, उसे समझने मैं परेशानी होती है। टॉम क्रूज़ उसका भाई दिखाया है, जो कम उम्र मैं अपना घर छोड़ कर चला गया, और अपने भाई के बारे मैं जाना भी तब, जब उसके स्वर्गवासी पिता की करोड़ों की रकम उसके भाई के नाम कर दी गयी।

यह फ़िल्म एक बहुत अच्छा उधारंद है मानवता के संबंधों के सहज शातिग्रस्थ होने की, और कैसे बीमारी को समझने और प्यार और समझदारी से उसे सँभालने की क्षमता की। टॉम क्रूज़ फिर भी अपने भी को जुआ खिलवाता है अपने पैसे बनने के लिए।

इस फ़िल्म के कलाकारी मैं कोई कमी नही है, परन्तु सोरिंग-हैट्स ही इस बीमारी को ठीक से दिखाय जाने या न जाने के बारे मैं और बता सकेंगी।

यह फ़िल्म ४ ऑस्कर जीत चुकी हैं।

Tuesday, July 22, 2008

मदद की राह पर

मन मैं तनाव किसको नही होता। हर नई जिंदगी की सीध पर ऐसे मोड़ आते हैं जो हमें सोच मैं दाल देते हैं। कभी किसी के प्रिय को बुख्खार हो जाए, तो अपना दर्द भी बध्ध जाता है। कोई ऐसी बीमारी जिसका ईलाज सालों साल बीते, वेह पीड़ित और जो उसके प्रिय हों, सबको हिला कर रख देता है। हम बहुत देर से ऐसे रोग देखते आएं हैं जो हमें दिखती हैं, एक खुले घाव की तरह। परन्तु मानसिक तनाव बहुत देर तक चले, तो समस्या सबके लिए और भी गंभीर हो जाती है। हमारा मन जितना ही फुर्तीला है, उतना ही धीमी गति से भी दौड़ सकता है, जितना चौकन्न है, उतना ही नासमझ्दार हो सकता है। इतना पुराना मन का तनाव इस प्रकार बढ़ता है, जैसी अन्तरिक्ष मैं से कोई पत्थर गिर्र रहा हो। इसे जान लेना, बहुत ज़रूरी है, और उतना ही फैदेमंद।

तनाव हर मनुष्य को हो सकता है - स्त्री को, और पुरूष को, बच्चे को, और बुधे को, गाँव और शहरों मैं। केवल समय-विशेष का अन्तर है। तनाव, बस यही शब्द है जिसे हम मन के हर प्रकार की समस्या को दे देते हैं। बस यही - एक तनाव। आज विज्ञापन ने इतने तरक्की कर ली है, परन्तु फिर भी हम वापस जाते हैं ओझा, पंडित, मौलवी इत्यादि के पास। मैंने यह नही का की यह सब ग़लत है। अपने पुर्न्द विशवास से हटने को नही कह रहा मैं। बस इतना की वेह आपकी सामने की समस्या को देखने से अंधाधुन्द न कर दे। परन्तु समस्या तो यह है की आपको कुछ दिख ही नही रहा। मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ की समस्या का समाधान करने के लिए समस्या का पता लगना मुमकिन हो। मैं आजसे कितने साल पुरानी बात बताता हूँ, जब विज्ञापन ने मन के रोगों को जानना शुरू ही कीया था, एक 'रेसेर्पीन' नामक रसायन को पेढ़ से निकाला था, भारतीय विज्ञापनों नैन, मानसिक रोगों का इलाज करने के लिए। आज वही रसायन लैब मैं बनता है जिससे मेरा इलाज शुरू हुआ था। आज आपका सामने मैं यह लिख रहा हूँ सोचने की हालत मैं। आशा यह करता हूँ की मैं आपको दिखला दूँ वही गलतियां जो मेरे माता पिता ने भी की थीं मुझे मनोवैज्ञानिक के पास न लेजाकर, इतने समय तक। "मैं पागल हूँ", वेह कहेंगे। यही सोच थी मेरे माता-पिता की। मैं उनको दोष नहीं देता। एक हिंदू परिवार मैं होके, बहुत यजना किए मुझे ठीक करने के लिए। अगर थोडी जल्द ही ले गए होते, तो अपनी डिग्री शायद सातवे साल तक नही चल रही होती। मैं पागल था, शायद कह सकूँ की अभी भी हूँ, केवल इसलिए, की मैं हिंदुस्तान के लोगों मैं बदलाव देख सकूँ, देख सकूँ फिल्मों मैं, रेडियो पर, आम जनता मैं, एक अपनापन देख सकूँ...

Friday, July 18, 2008

स्कित्जोफ्रेनिया

इस बीमारी मैं एक ऐसी व्यवस्था हो जाती है, जिसमे रोगी सच्चाई और अपनी ख़ुद की बनाई दुनिया के बीचों-बीच अन्तर नही जान पाटा। हर रोगी को अलग किस्म के अनुभव अवं कल्पनायें होती हैं अपनी दुनिया की।

१) ज़्यादातर बीमार व्यक्ति को भय होता है की कोई उसे या उसके प्रिय को नुक्सान पहुँचने की कोशिश मैं है।
इस व्यवस्था को पेरानूइड के नाम से जानते हैं।
२) दूसरा किस्म है जिसमें व्यक्ति एक ही जगह पे, एक ही तरह से स्थिर हो जाता है, और बहुत देर बाद हिलता है, कभी कभी तो इतनी देर की उसका बदन नीला पड़ने लगता है। इसकी घटित होने की संभावना ज्यादा उन् देशों मैं या उन जगह मैं कम है जिनमें भाषा विकसित है। इस व्यवस्था को काट्टोनिया कहतें हैं।

काफ़ी समय तक रोगी को ऐसी आवाजें सुनी पढ़ सकती हैं जो असलियत मैं हैं नही, या चीजें दिखाई देने लगें। क्योंकि इन व्यक्तियों का दिमाग यह खेल खेल रहा है, इसलिए समझाना भी काफ़ी बार बेकार सा पढ़ जाता है। समझने की शक्ति भी कम हो जाती है और काम करने की आशा भी नही रहती।

आम तौर पर, पुरुषों मैं यह १३-१४ वर्ष मैं शुरू होता है, और लड़कियों मैं २३-२७ की उम्र के बीच। बूद्धों को अगर इसी प्रकार की बीमारी हो, तो उससे पेराफ्रेनिया का नाम देते हैं। कई बार ८ साल के बच्चों मैं भी यह हो जाता है। हर देश मैं, तकरीबन ०.१% की जनता मैं यह दिमागी हालत पाई जाती है।

इनका इलाज दवाइयां ही कर सकती हैं, जिसके साथ साथ व्यक्ति के ठीक होने की शक्ति, अवेम सबका समर्थन भी ज़रूरी है।

दाएं ओउर मैं जो इसी नाम का लिंक है, वेह इस विषय की बहुत जानकारी देता है, यहाँ तक की पंजाबी, बंगाली, और उर्दू मैं भी।

Monday, July 14, 2008

अपरिचित

जैसे इस फ़िल्म का नाम बताता है, यह फ़िल्म एक ऐसे स्तिथि की बात बताती है जिसमे एक मनुष्य को अपनेआप से परिचय न हो। इसमे एक व्यक्ति के एक से अधिक अस्तित्व होते हैं, और वे अपने अनेक अस्तित्व के मौजूदगी के बारे मैं नही जानता/जानती। इससे स्प्लिट-पेर्सोनालिटी या मल्टीपल-पेर्सोनालिटी दिसोर्द्र के नाम से जान जाता है, किंतु नै खोज द्वारा, अब इसका नाम दिसोसिअतिवे-इदेंतिती-दिसोर्देर (दी.आई.दी.) है। इससे पीड़ित व्यक्ति को अलग-अलग प्रकार से अपने अस्तित्वओं मैं बाहरी दुनिया का एहसास होता है। यह बिमारी बहुत कम मातृ मैं पायी जाती है, और पूरी दुनिया मैं इस बिमारी के केवल ५० व्यक्तिगत विव्रंद हैं।

यह फ़िल्म तामिल मैं बनायी गयी है, पर मैंने इससे हिंदी मैं देखि है क्योंकि मैं तामिल नही समझता। फ़िल्म बहुत ही विचित्र प्रकार से बनाई गयी है, काफ़ी नयी तकनीकियों का भी प्रयोग किया गया है। महत्वपुर्न्दा कलाकार ने अपना चरित्र भी बहुत अच्छे से निभाया है। कलाकार के असली रूप से अलग, उसके २ और रूप दिखाए गएँ हैं, पहेला जिसमे वह खूनी है, और दूसरा एक आशिक।

फ़िल्म के चित्रंद मैं सबसे बड़ी गलती यह है, की जब उसके दिमागी हालत को जांचा जा रहा था, तो कोई ई.ई.जी नही ली गयी। उसके पहले, खुनी रूप मैं, उसको अपनी आँखे हिलाते बहुत दिखाया गया है, और केवल इन दो वजह से, यह भी कहा जा सकता था की उसे एपिलेप्सी भी हो। किन्तु फ़िल्म बहुत अच्छे से बनाई गयी है और अंत मैं यही कह सकते हैं की यह दी.आई.दी की कल्पना है।

सावधान: यह कमज़ोर दिल वालों के लिए नही है।