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Tuesday, July 22, 2008

मदद की राह पर

मन मैं तनाव किसको नही होता। हर नई जिंदगी की सीध पर ऐसे मोड़ आते हैं जो हमें सोच मैं दाल देते हैं। कभी किसी के प्रिय को बुख्खार हो जाए, तो अपना दर्द भी बध्ध जाता है। कोई ऐसी बीमारी जिसका ईलाज सालों साल बीते, वेह पीड़ित और जो उसके प्रिय हों, सबको हिला कर रख देता है। हम बहुत देर से ऐसे रोग देखते आएं हैं जो हमें दिखती हैं, एक खुले घाव की तरह। परन्तु मानसिक तनाव बहुत देर तक चले, तो समस्या सबके लिए और भी गंभीर हो जाती है। हमारा मन जितना ही फुर्तीला है, उतना ही धीमी गति से भी दौड़ सकता है, जितना चौकन्न है, उतना ही नासमझ्दार हो सकता है। इतना पुराना मन का तनाव इस प्रकार बढ़ता है, जैसी अन्तरिक्ष मैं से कोई पत्थर गिर्र रहा हो। इसे जान लेना, बहुत ज़रूरी है, और उतना ही फैदेमंद।

तनाव हर मनुष्य को हो सकता है - स्त्री को, और पुरूष को, बच्चे को, और बुधे को, गाँव और शहरों मैं। केवल समय-विशेष का अन्तर है। तनाव, बस यही शब्द है जिसे हम मन के हर प्रकार की समस्या को दे देते हैं। बस यही - एक तनाव। आज विज्ञापन ने इतने तरक्की कर ली है, परन्तु फिर भी हम वापस जाते हैं ओझा, पंडित, मौलवी इत्यादि के पास। मैंने यह नही का की यह सब ग़लत है। अपने पुर्न्द विशवास से हटने को नही कह रहा मैं। बस इतना की वेह आपकी सामने की समस्या को देखने से अंधाधुन्द न कर दे। परन्तु समस्या तो यह है की आपको कुछ दिख ही नही रहा। मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ की समस्या का समाधान करने के लिए समस्या का पता लगना मुमकिन हो। मैं आजसे कितने साल पुरानी बात बताता हूँ, जब विज्ञापन ने मन के रोगों को जानना शुरू ही कीया था, एक 'रेसेर्पीन' नामक रसायन को पेढ़ से निकाला था, भारतीय विज्ञापनों नैन, मानसिक रोगों का इलाज करने के लिए। आज वही रसायन लैब मैं बनता है जिससे मेरा इलाज शुरू हुआ था। आज आपका सामने मैं यह लिख रहा हूँ सोचने की हालत मैं। आशा यह करता हूँ की मैं आपको दिखला दूँ वही गलतियां जो मेरे माता पिता ने भी की थीं मुझे मनोवैज्ञानिक के पास न लेजाकर, इतने समय तक। "मैं पागल हूँ", वेह कहेंगे। यही सोच थी मेरे माता-पिता की। मैं उनको दोष नहीं देता। एक हिंदू परिवार मैं होके, बहुत यजना किए मुझे ठीक करने के लिए। अगर थोडी जल्द ही ले गए होते, तो अपनी डिग्री शायद सातवे साल तक नही चल रही होती। मैं पागल था, शायद कह सकूँ की अभी भी हूँ, केवल इसलिए, की मैं हिंदुस्तान के लोगों मैं बदलाव देख सकूँ, देख सकूँ फिल्मों मैं, रेडियो पर, आम जनता मैं, एक अपनापन देख सकूँ...

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