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Thursday, March 6, 2008

मेरा परिचय

मैं आप सबको अपने बारे में एक छोटा सा परिचय देना चाहूँगा, यह बताने के लिए की मैं भी उन्ही समस्याओं का सामना कर चुका हूँ जिनमे से आप या आपके प्रिय गुज़र रहें हों। मैं मानसिक रोग से पीड़ित हूँ और मुझे अपने अस्तित्व पर गर्व है। मुझे गर्व है की मैं उन चंद व्यक्तियों में से हूँ जो ऐसी परिस्थितियों मे से गुज़ारा हो जिन्हें पाने की न तो किसी की इच्छा हो और न ही किसी को आशा। लोग समझ बैठते हैं की म यह ैं कह रहा हूँ क्योंकि मैं निकल चुका हूँ इन रोग की बुरी नज़रों से। शायद वे सही हैं। मैं नहीं चाहता की किसी और को इन मुश्किलों का सामना करना पढे। इसीलिए मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूँ। मुझे बस गर्व अपने रोग का इसलिए है क्योंकि पिछले करीबन ग्यारह वर्षों से, इसमें समां जाने से ले कर, इससे बाहर निकल आने की कई कोशिशों ने मुझे मनुष्य जीवन अथवा मस्तिष्क की ऐसी सीख दी हैं जो इसके बिना शायद सम्भव न होतीं। इसका यह मतलब नहीं की जो इन मुश्किलों का सामना न करे, वह ज़िंदगी को बारीकी से नहीं देख पाएगा। आखिरकार हर व्यक्ति अद्वितीय है, एक अनमोल रत्न है

मैं ग्यारह बरस का था जब मुझे रट लग गयी गाने सुनने की, पुरा दिन वही कैसेटपढ़ाई में मुझे दिक्कत होने लगी और बहुत कम अंकों से अगली कक्षा में जा पायाअगले दो साल इतनी महनत करी की जैसे वह एक साल बढे होने का एक हिस्सा थाजब चौदाहन वर्ष का हुआ मेरे ख़याल कुछ ज़्यादा मजबूत हो गएऐसा लगा जैसे अब मुझमे इतनी हिम्मत गयी हो की किसी भी कठिनाई का सामना कर पाऊंधीरे धीरे, मेरे बिना समझे, मेरे ख्यालों ने एक ऊँचा स्वर ले लियावे मुझे सुनने देने लगेचंद बरस बीत गएहर कक्षा में पास होना मुश्किल हो गयामैंने एक ऐसे व्यक्तित्व को अपना लिया जिससे मुझे लगता था की सिर्फ़ मैं ही दुनिया को बचा सकता हूँउन ऊँची आवाजों के साथ बातें करने लगा, मन ही मन मेंअपने परिवार वालों को अपना दुश्मन मानने लगाबात करना बंद कर दियानींद का तो नामो निशाँ रहाघर का माहौल बिगड़ गयाघर से कई बार भागा, भटक भटक के फिर वापस जाताकटे हुए शव दिखाई देतेकई बार आत्महत्या करने की कोशिश की। अठारह बरस का हुआ, और अपने बोर्ड के अन्तिम परीक्षा से पहले अस्पताल में भरती कराया गया जब मेरी आत्महत्या की कोशिश कामयाबी पर थीअभी तक मेरे माता पिता को समझ नहीं रहा था की मेरा व्यवहार ऐसा क्यों हैमुझे एक मनोवैज्ञानिक के पास भी ले गए थे, परन्तु कोई फरक न पड़ाअब, मेरे माता पिता, जिन्हें मनोरोग-चिकित्सक से एक किसम का भय था, इस विचार से की वे सबको पागल बना देते हैं, मुझे एक मनोरोग-चिकित्सक के पास ले ही गएमुझे कह दिया गया की बस थोड़ा सा मन में तनाव हैतबियत मेरी कुछ ठीक होने लगीएक साल बाद पता लगा की मुझे स्कित्ज़ोफ्रेनिया हैधीरे धीरे यह भी अहसास हुआ की मुझे .सी.डी, यानी, मनोग्रस्त्ता बाध्यकारी की बीमारी भी है

आज मैं पचीस बरस का होने लगा हूँ, इन्जिनीरिंग कर रहा हूँ, और मेरी ज़िंदगी में बाधा डाल रही है मेरी बाईपोलर की बीमारी, जिसके कारंद मैं कभी उदासी मैं चला जाता हूँ, और कभी मेरा दिमाग इतना फुर्तीला हो जाता है की विचारों को पकड़ नही पाता, यानी, अपनी सोच को ही समझने का समय नही मिलतामुश्किलें और भी बहुत आती हैं, जिनका ज़िक्र इस ब्लॉग में आगे चलकर होता रहेगाज़रूरी बात बस यही हैं की आप समझने की अपेक्षा रखें


1 comment:

D.K. Google said...

बहुत अच्छा लिखा आपने, मेरा घर भी कुछ इसी तरह की समस्या से जूझ रहा है, समझ में नहीं आता कि क्या करूँ? मेरी इकलौती बहन को 'स्किजोफ्रेनीया' है।
यहाँ आपने अपना ई-मेल भी नहीं दिया कि मैं आपसे अपने विचारों को बाँट सकूँ। मैं अपना ई-मेल यहाँ छोड़ रहा हूँ। मुझसे जल्द संपर्क करने कि कृपा करें।
dharmendra61@gmail.com